मंगलवार, 23 जून 2009

'' बस यूँ ही ''


'' बस यूँ ही ''




जिंदगी की रहगुज़र ,

जाने कितना भटकेंगे ,

कितने साथ मिलेंगे ,

कितने हाथ हैं छूटेंगे ,

जीना है टुकडों-टुकडों में,

जाने कितने टुकड़े सहजेगे ,

कितने टुकड़े अभी और भी टूटेंगे||

**********************************************



श्याम सखा "श्याम " के ब्लॉग पर पोस्ट एक कविता से प्रेरित {सादर}


कुछ यक्ष प्रश्न भी होते है ,

कैसे इनसे छुटकारा पाएंगे ,

लहरों -तुफानो से कर यारी ,

खुद तो पार निकल जायेंगे ,

छोड़ी जो मझधार कश्ती ,

औरों को कैसे पार लगायेंगे ?







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2 टिप्पणियाँ:

'अदा' 28 जून 2009 को 7:34 pm  

कुछ यक्ष प्रश्न भी होते है ,

कैसे इनसे छुटकारा पाएंगे ,

लहरों -तुफानो से कर यारी ,

खुद तो पार निकल जायेंगे ,

छोड़ी जो मझधार कश्ती ,

औरों को कैसे पार लगायेंगे ?

बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ

'अदा' 28 जून 2009 को 7:38 pm  

जिंदगी की रहगुज़र ,

जाने कितना भटकेंगे ,

कितने साथ मिलेंगे ,

कितने हाथ हैं छूटेंगे ,

सत्य वचन !!
बहुत अच्छी अभिव्यक्ति !!
आप बधाई के पात्र हैं ..

" रोमन[अंग्रेजी]मेंहिन्दी-उच्चारण टाइप करें: नागरी हिन्दी प्राप्त कर कॉपी-पेस्ट करें "

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विजेट आपके ब्लॉग पर

TRASLATE

Translation

" उन्मुक्त हो जायें "



हर व्यक्ति अपने मन के ' गुबारों 'से घुट रहा है ,पढ़े लिखे लोगों के लिए ब्लॉग एक अच्छा माध्यम उपलब्ध है
और जब से इन्टरनेट सेवाएं सस्ती एवं सर्व - सुलभ हुई और मिडिया में सेलीब्रिटिज के ब्लोग्स का जिक्र होना शुरू हुआ यह क्रेज और बढा है हो सकता हैं कल हमें मालूम हो कि इंटरनेट की ओर लोगों को आकर्षित करने हेतु यह एक पब्लिसिटी का शोशा मात्र था |

हर एक मन कविमन होता है , हर एक के अन्दर एक कथाकार या किस्सागो छुपा होता है | हर व्यक्ति एक अच्छा समालोचक होता है \और सभी अपने इर्दगिर्द एक रहस्यात्मक आभा-मंडल देखना चाहतें हैं ||
एक व्यक्तिगत सवाल ? इमानदार जवाब चाहूँगा :- क्या आप सदैव अपनी इंटीलेक्चुएलटीज या गुरुडम लादे लादे थकते नहीं ?

क्या आप का मन कभी किसी भी व्यवस्था के लिए खीज कर नहीं कहता
............................................

"उतार फेंक अपने तन मन पे ओढे सारे भार ,
नीचे हो हरी धरती ,ऊपर अनंत नीला आकाश,
भर सीने में सुबू की महकती शबनमी हवाएं ,
जोर-जोर से चिल्लाएं " हे हो , हे हो ,हे हो ",
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
फिर सुनते रहें गूंज अनुगूँज और प्रति गूंज||"

मेरा तो करता है : और मैं कर भी डालता हूँ

इसे अवश्य पढें " धार्मिकता एवं सम्प्रदायिकता का अन्तर " और पढ़ कर अपनी शंकाएँ उठायें ;
इस के साथ कुछ और भी है पर है सारगर्भित
बीच में एक लम्बा अरसा अव्यवस्थित रहा , परिवार में और खानदान में कई मौतें देखीं कई दोस्त खो दिये ;बस किसी तरीके से सम्हलने की जद्दोजहद जारी है देखें :---
" शब्द नित्य है या अनित्य?? "
बताईयेगा कितना सफल रहा |
हाँ मेरे सवाल का ज़वाब यदि आप खुले - आम देना न चाहें तो मेरे इ -मेल पर दे सकते है , ,पर दें जरुर !!!!



कदमों के निशां

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