शुक्रवार, 19 जून 2009

" काग़ज़ भी पिघलेगा ",




"काग़ज़ भी पिघलेगा, "

यह ज़हां है इक मेला ,

हर इक ज़िंदगानी सजाती ,

अपना-अपना खेला ,

रूप पर तो बहरूप है ही,

पर बहुतों ने बहरूप पर भी,

रूप का लगाया झमेला !!

क्या कभी देखा नहीं ,

किसी को भीड़ में भी अकेला,

किसी का मौन भी मुखर होता है,

पर कभी पढ़ना तुम किसी की ,

प्रखर-मुखरता के पीछे का लेखा ||

तेरे ही आंसू से काग़ज़ भी पिघलेगा,

लेखनी कांपेगी, शब्द खो जायेंगे , उस पीड़ा से ,
सारी अनुभूतियाँ सारी सवेदानाएं सारे भावः ,
फ़िर से निरक्षर हो जायेंगे ||

जिस क्षण तुम,
इस अन्तरिक्षीय निशाब्द्धता को ,
शब्द रूप देपाओगे ,
उसी क्षण से ,
भवभूति-वाल्मीकि-कालिदास से हो जाओगे ||







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6 टिप्पणियाँ:

ओम आर्य 19 जून 2009 को 2:37 pm  

बहुत ही सुन्दर पोस्ट और ब्लोग और आपकी रचना भी ..............क्या कहने

raj 20 जून 2009 को 12:14 pm  

तेरे ही आंसू से काग़ज़ भी पिघलेगा,wonderful..

श्याम सखा 'श्याम' 20 जून 2009 को 6:56 pm  

सुन्दर शब्द-मनहर प्रस्तुति
श्याम सखा

इन गज़लों को पूरा पढें यहां
१उम्र भर साथ था निभाना जिन्हें
फासिला उनके दरमियान भी था

२‘.जानेमन इतनी तुम्हारी याद आती है कि बस......’


http//:gazalkbahane.blogspot.com/ पर एक-दो गज़ल वज्न सहित हर सप्ताह या
http//:katha-kavita.blogspot.com/ पर कविता ,कथा, लघु-कथा,वैचारिक लेख पढें

Mrs. Asha Joglekar 22 जून 2009 को 8:26 pm  

लेखनी कांपेगी, शब्द खो जायेंगे , उस पीड़ा से ,
सारी अनुभूतियाँ सारी सवेदानाएं सारे भाव ,
फ़िर से निरक्षर हो जायेंगे ||
अद्भुत !
और मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करने का आभार । सरस्वती का आशिर्वाद हम सब पर बना रहे । हमें उनका भक्त ही रहने दें प्लीज़ ।

अक्षय-मन 22 जून 2009 को 8:38 pm  

sadhuwaad........jitna kaha jaye utna kam.....
bahut hi accha likha hai....shandaar

'अदा' 27 जून 2009 को 9:41 pm  

जिस क्षण तुम,
इस अन्तरिक्षीय निशाब्द्धता को ,
शब्द रूप देपाओगे ,
उसी क्षण से ,
भवभूति-वाल्मीकि-कालिदास से हो जाओगे ||

bemisaal..
bahut khoob likha hai aapne..

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Translation

" उन्मुक्त हो जायें "



हर व्यक्ति अपने मन के ' गुबारों 'से घुट रहा है ,पढ़े लिखे लोगों के लिए ब्लॉग एक अच्छा माध्यम उपलब्ध है
और जब से इन्टरनेट सेवाएं सस्ती एवं सर्व - सुलभ हुई और मिडिया में सेलीब्रिटिज के ब्लोग्स का जिक्र होना शुरू हुआ यह क्रेज और बढा है हो सकता हैं कल हमें मालूम हो कि इंटरनेट की ओर लोगों को आकर्षित करने हेतु यह एक पब्लिसिटी का शोशा मात्र था |

हर एक मन कविमन होता है , हर एक के अन्दर एक कथाकार या किस्सागो छुपा होता है | हर व्यक्ति एक अच्छा समालोचक होता है \और सभी अपने इर्दगिर्द एक रहस्यात्मक आभा-मंडल देखना चाहतें हैं ||
एक व्यक्तिगत सवाल ? इमानदार जवाब चाहूँगा :- क्या आप सदैव अपनी इंटीलेक्चुएलटीज या गुरुडम लादे लादे थकते नहीं ?

क्या आप का मन कभी किसी भी व्यवस्था के लिए खीज कर नहीं कहता
............................................

"उतार फेंक अपने तन मन पे ओढे सारे भार ,
नीचे हो हरी धरती ,ऊपर अनंत नीला आकाश,
भर सीने में सुबू की महकती शबनमी हवाएं ,
जोर-जोर से चिल्लाएं " हे हो , हे हो ,हे हो ",
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
फिर सुनते रहें गूंज अनुगूँज और प्रति गूंज||"

मेरा तो करता है : और मैं कर भी डालता हूँ

इसे अवश्य पढें " धार्मिकता एवं सम्प्रदायिकता का अन्तर " और पढ़ कर अपनी शंकाएँ उठायें ;
इस के साथ कुछ और भी है पर है सारगर्भित
बीच में एक लम्बा अरसा अव्यवस्थित रहा , परिवार में और खानदान में कई मौतें देखीं कई दोस्त खो दिये ;बस किसी तरीके से सम्हलने की जद्दोजहद जारी है देखें :---
" शब्द नित्य है या अनित्य?? "
बताईयेगा कितना सफल रहा |
हाँ मेरे सवाल का ज़वाब यदि आप खुले - आम देना न चाहें तो मेरे इ -मेल पर दे सकते है , ,पर दें जरुर !!!!



कदमों के निशां

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