'' कुछ करना है कुछ कर जाना है '' ,
| " कुछ करना है : : कुछ करजाना है " | ||
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कबीरा खड़ा बाज़ार में ,लिए लुकाठी हाथ जो फूँके घर आपणा, चले हमारे साथ|| निंदक नेणे राखि आँगन कुटी छवाये || रहिमन धागा प्रेम का , तोड़ो मत चटकाय : : टूटे फिर न जुड़े , जुड़े तो गाँठ पड़ जाए | |
| " कुछ करना है : : कुछ करजाना है " | ||
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नीचे दी रचना श्री दिगंबर नासवा, जी की एक रचना से प्रेरित , इसनें भाव तो उनके ही हैं ,यहाँ तक की लगभग सभी शब्द भी उन्ही के हैं ,मैं उनकी सम्बंधित रचना पढ़ प्रशंसात्मक टिप्पणी लिखने का प्रयत्न कर रहा था कि मैं यह कर बैठा ,उनकी उस रचना के उतरार्ध को छंद बद्ध करने का प्रयत्न करने कि गुस्ताखी कर बैठा उनकी अनुमति से उनको समर्पित करते हुए मैं इसे कबीरा पर प्रकाशित कर रहा हूँ | पाठक उनके ब्लॉग '' स्वप्न मेरे '' पर '' अनबुझी प्यास'' अवश्य पढ़ें जैसे सहयात्री हो नीले सागर का , कोसों कोस साथ चले ये रेत-समुन्दर भी , तोड़ तट के हर बंधन उन्मुक्त सागर लहरें , करती उदघोष और नर्तन जब आतीं हैं ' ले आगोश हर रेती- कण की प्यास बुझाती हैं , सागर को अपनी छाया देते नीलाभ गगन पर, ऐसे ही क्षण इन्द्रधनुषी रंग बिखर जातें है , पर प्यास अनन्त अतः मिलन दोहराए जाते हैं|| *********************************************************************** हाँ यह मेरी है ,प्रकाशन के पूर्व जरासी चूक से प्रथम अक्षर गायब होगया पता नही क्याथा ,कभी याद आया तो संशोधित कर दूंगा ,कम्प्यूटर फोर्मेट करते समय संकलन ही उड़ गया संवेदना ??? ; संवेदना है / मौन : सांत्वना है / स्पर्श : सुकूं है / शब्द : रुदन है = ??? : आँसू हैं / मुस्कान : इबादत है / हँसी : समर्पण है/ मिलन : ब्रह्म है // |
" अपना क्या "
अपना क्या ' ज़िन्दगी ',की शाम हुयी उम्र यूँ ही तमाम हुयी , ज्यूँ सूरज डूबेगा त्यों ही रूह उसके नाम हुयी, मुक्त हुआ मैं इस एकान्तिक अभिशाप से , पर रखना यकीं फिर आऊंगा , रूप बदल जायेगा ? पहचान पाओगी ? तब तुम्हे कोई इन्द्रधनुषी गीत सुनाऊंगा , आऊंगा और शब्दों की सृष्टि पुनः पुनः रचाऊंगा, मेरे शब्दों की पूंजी तेरे पास होगी , जब मांगू दे देना वरना , फिर से अभिशप्त हो जाऊंगा !!!फिर से अभिशप्त हो जाऊंगा
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विमी जी एक चितेरा कभी मुझे भी मिला था, बचपन में बनाता हुआ इन्द्रधनुषी पुल , मैंने उससे पूछा भी था , यह क्या करते हो , वह बोला भगवान के घर , जाने को पुल बनाता हूँ मैंने फ़िर पूछा था , लेमन - चूस खाओगे , तब चाकलेट नहीं मिलते थे , यही मिलता था एक पैसे के दस , पर मुझे ऐसे ऐसे दो पुल बना कर दे दो । पूछा गया - क्या करोगे उत्तर -भगवन से मिलाने जाउगा प्रश्न - क्यों ? कहूँगा सदगुर दद्दा को वापस भेजो | पर दो क्यों ? एक जाने एक वापस आने के लिए!! { आप के लिए }
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" उमर वो बचपन की "
अब क्या भूलूं क्या याद करूँ , लौटेगी न उमर वो बचपन की , वक्त से चाहे जितनी विनती-फरियाद करूँ || माँ का गुस्सा , दीदी की मनुहार , दद्दा का इकरार , बाबूजी का प्यार, भूले-भटके मिलते थे कभी-कभी , माँ नरम ,बाबूजी गरम ,दीदी चि़ड़चिड़,दद्दा के तेवर , ब्याज में भौजाई से तकरार जमा-पूंजी यही बचपन की, वो सब रह-रह याद करूँ उम्र जो गुज़री पचपन की || अब क्या भूलूं क्या याद करूँ , लौटेगी न उमर वो बचपन की , वक्त से चाहे जितनी विनती-फरियाद करूँ ||
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"काग़ज़ भी पिघलेगा, "
यह ज़हां है इक मेला , हर इक ज़िंदगानी सजाती , अपना-अपना खेला , रूप पर तो बहरूप है ही, पर बहुतों ने बहरूप पर भी, रूप का लगाया झमेला !! क्या कभी देखा नहीं , किसी को भीड़ में भी अकेला, किसी का मौन भी मुखर होता है, पर कभी पढ़ना तुम किसी की , प्रखर-मुखरता के पीछे का लेखा || तेरे ही आंसू से काग़ज़ भी पिघलेगा, लेखनी कांपेगी, शब्द खो जायेंगे , उस पीड़ा से , सारी अनुभूतियाँ सारी सवेदानाएं सारे भावः , फ़िर से निरक्षर हो जायेंगे || जिस क्षण तुम, इस अन्तरिक्षीय निशाब्द्धता को , शब्द रूप देपाओगे , उसी क्षण से , भवभूति-वाल्मीकि-कालिदास से हो जाओगे ||
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निराशाओं के हलाहल-सागर मध्य से , असफलताओं का बोझ ले, पुनः-पुनः संघर्ष करते गुज़रना, नीलकंठ होने की मात्र अनुभूति ही दे पाता है , और हो बाध्य तभी हम , स्वीकार पाते हैं 'माँ फलेषु कदचिना ' || हाय रे फ़िर भी हम नीलकंठ हो पाते , इन्सां हैं हम चुभती है, असफलताओं की फांस ; कभी-कभी , रिश्ते हमारे बना इन्ही का नश्तर हैं चुभाते, इस पीड़ा संग राग-द्वेष निर्लिप्त नहीं हम , इसी लिए तो नीलकंठ नही हो पाते | नीलकंठ नही हो पाते||
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| " काश मैं भी हो पता नीलकंठ " |
कोशिश कर कभी सुनना विरानो के गीत , तन्हाई की सिसकियां भी होंगी ऐ अनजाने मीत ! खामोशी का संगीत जब भी आप गुनगुनायेंगे , लय की लरज़ में मुझे ही अकेला खडा पायेगे ! अपनी हर हर नज्म में ,कर्ण की रुसवाई को जीता हुआ मुझे ही पायेंगें ,भीष्म की तन्हाईयों का विष पीता हुआ! घायल रूहों का कारवां लिए,काँधे पे उठाये उम्मीदों का सलीब ; सत्य-आग्रही गाँधी मैं हुआ नही, ,कहाँ से लाता ईसा सा नसीब !! इस धरा की सारी रुसवाई : तनहाई का विष मैं पी जाता : जी जाता : मैं भी होता अगर नीलकंठ , हो पाता मैं भी काश नीलकंठ !! हो पाता मैं भी काश नीलकंठ !! मैं भी काश नीलकंठ!! मैं भी नीलकंठ !!
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| आंसू और तनहाई |
याराँ वो तो बेवफा हुआ, गम में जो आँसू , आँखों से जुदा हुआ, ये रिश्ता हों , ना रुसवा, इसीलिएतो लोग, अकेले में ही रोते हैं || |
| " ज़िन्दगी की नियति " === ="भटकन ~ थकन ~ मंजिल ~ चलना:सफर " |
'भटकन होगी लम्बी वक़्त की रहगुज़र भी , लम्बी मिलेगी जितनी ज़िन्दगी , भटकने:ढूँढने के खेल के रोमांस औ रोमांच में कब कैसे गुज़रा वक़्त ? खुद वक़्त ही नहीं जान पाता थकन जब-जब थक जाईए , रूकइए सुस्ताइए , अपनी यादों की छाँव में , जरा सोचिये भी , क्या -क्या ले कर थे निकले , उम्र के इस छोर आने तक , क्या खोया क्या पाया , रिश्तों को कौन सहेज सका , कितना , खुद मैं भी जी पाया , गोया कि सफ़र अभी है बाकी| |
| ढूँढ ले अपनी मंजिल कोई , यारा कर दे शुरू सफ़र अपना;
ज़िंदगी की इस राह-गुज़र पर, मिले कभी कई क़ाफिले होंगें
कभी शब-ए-बियाँबां बसर होगा, गुलज़ार वतन भी होंगें ;
गुल होंगे तो ख्वार भी होंगे धूप होगी तो छावं भी होगी ,
सपनों का शहर होगा ; ख्वाहिशों का म-क़बर होगा;
इसी ज़ुस्तजु-ए-मंजिल का नाम ही तो ज़िन्दगी है |
kabeeraa { म-क़बर=क़ब्रिस्तान, जुस्तजू= तलाश या खोज ,ख्वार=कांटे=दुःख,तक़लीफें, शब=रात }
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"ये खामोशी जीने दो " शुक्र खुदा ' हर रात यूं वीरान अँधेरी है ', कहते है दर्द से दर्द को राह ए सुकूँ होती है ! सिसकियाँ दूर तक सुनी जाती हैं विरानो में , श्श्श्श....रात को अपनी ये खामोशी जीने दो ! हर गम ए दिल के दर्द ए गम को राह पाने दो , न हो नासूर हर घाव,हर ज़िन्दगी आतिश-फशां ! पर रोते चेहरे भी हों न जाएँ रुसवा ,बेगानों में , इसी लिए हर रात वीरानी है हर रात अँधेरी है !!! श्श्श्श....रात को अपनी ये खामोशी जीने दो ! [ आतिश -फशां = ज्वालामुखी = volcano] पुनःप्रकाशित |
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मेरे "कबीरा " ब्लॉग पर एक महिला ने किसी कविता की प्रशंसा कीथी ,धन्यवाद ज्ञापन में वहाँ तक गया क्यो कि उस पर कविताएँ होंगी ऐसा मेरी सोच थी और ऐसा थाभी परन्तु एक कविता वहाँ पर एक कविता में आतंक वादी का शब्द चित्रण दिया था पर वह उसे ग्लोरिफाई करता था वहा टिप्पणी और उन्ही कि दो कविताओं से प्रेरणा ले मैंने भी कुछ लाईने कहने का प्रयत्न किया है | प्रेरणा के लिए मैं whimsical का आभारी हूँ [
मैं नही जानता कि मेरी इस कविता / नज्म को पाठक गण किस श्रेणी में लेंगे मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूँ कि मूलतः मैं कवि नही हूँ ,ओर जो हूँ वह भूल सा रहा हूँ क्योंकि 'नून-तेल -लकडी ' के चक्कर ने उसे से दूर कर दिया है | आज जो प्रस्तुत कर रहा हूँ वह आज के समाज कि भावनात्मक सच्चाई ही है , हर सच्चे भारतीय कि मनो इच्छा ,मनो भावना है ऐसा मुझे लग रहा है | वास्तव में कल वार्षिक परम्परा के अनुसार 'गुरु नानक देव जी ' के जन्म उत्सव [कार्तिक पूर्णिमा 2008 नवम्बर 13 दिन गुरुवार ] के उपलक्ष्य में शोभायात्रा निकली थी ओर आज सुबुं समाचार -पत्रों में प्रज्ञा ठाकुर केस के सम्बन्ध में पढ़ कर कल से ही गुनगुना रहा 'देग-तेग फतह ' [कल इसका उदघोष शोभा यात्रा में हो रहा था ] आज 2008 नवम्बर 11 मंगलवार को इस रूप में सामने आया है | वैसे लगे हाथ मैं स्पष्ट कर दूँ कि मै भी सहज धारी सिक्ख ही हूँ ; यहाँ जनसामान्य का एक भ्रम दूर कर दूँ कि सिक्खी का आरंभ 'गुरु नानक देव जी से होता है , दसवें गुरु 'गुरु गोविन्द सिंह जी ' ने तो उसके सैनिक रूप -अंग को खालसा -पंथ के रूप में सामाजिक रूप से मान्यता दिला कर ,एक क्रांति का सूत्रपात करा था वे युग-दृष्टा : युग-सृष्टा महाऋषि थे ; जिस प्रकार प्राचीन युगों में मंत्र दृष्टा ऋषि हुआ करते थे , वे आधुनिक युग में उसी परम्परा के ध्वजा वाहक थे , | सामान्यतः इस ब्लॉग पर मैं बातें ना कर के अपने मन के भाव कुछ पंक्तियों में व्यक्त करने का प्रयत्न करता हूँ | कविता [मेरे अनुसार ] पूर्णता असम्पादित है कही बोलने में अटपटा लगे ,प्रवाह रुके तो क्षमा प्रार्थी हूँ \ टिप्पणियाँ अवश्य दें :------>
चाहतें हैं ||"उतार फेंक अपने तन मन पे ओढे सारे भार ,
नीचे हो हरी धरती ,ऊपर अनंत नीला आकाश,
भर सीने में सुबू की महकती शबनमी हवाएं ,
जोर-जोर से चिल्लाएं " हे हो , हे हो ,हे हो ",
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फिर सुनते रहें गूंज अनुगूँज और प्रति गूंज||"
इसे अवश्य पढें " धार्मिकता एवं सम्प्रदायिकता का अन्तर " और पढ़ कर अपनी शंकाएँ उठायें ;इस के साथ कुछ और भी है पर है सारगर्भित
" शब्द नित्य है या अनित्य?? "बताईयेगा कितना सफल रहा |
जीवन की इस सँध्याबेला में,
समय के चौराहे पर खड़ा अकेला मैं,
ज़र्जर देह संग काँपते स्वर और अधर हैं,
राह कठिन और पग लड़खडा़ रहे,
वो दूर कहीं दूर पर आयु के झरोखे ,
मुझे बुला रहे ,मुझे बुला रहे ॥
| बस विदा गान की रीत है बाकी , श्वासों की डोली में , यादें बन कर बैठीं दुल्हन ; सब मिल गाओ गीत विदा के अब प्राणों की यह बारात , जब चल पड़ी ,चल पड़ी, चल पड़ी ॥ | | है देखी वक्त की ये रीत निराली , पहले काटे न कटती थीं रातें , उगता न था सूरज भी जल्दी, पर चाँद छुपा जल्दी आई दुपहरी, समय न ठहरा गुजरा निष्ठुर मौन , जब प्रिय मिलन की रात चल पड़ी, चल पड़ी ,चल पड़ी,।। |
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