गुरुवार, 9 जुलाई 2009

" मेरे शब्दों की पूंजी तेरे पास होगी ,"




" अपना क्या "


अपना क्या
' ज़िन्दगी ',की शाम हुयी
उम्र यूँ ही तमाम हुयी ,
ज्यूँ सूरज डूबेगा
त्यों ही रूह उसके नाम हुयी,
मुक्त हुआ मैं इस एकान्तिक अभिशाप से ,
पर रखना यकीं फिर आऊंगा ,
रूप बदल जायेगा ?
पहचान पाओगी ?
तब तुम्हे कोई
इन्द्रधनुषी गीत सुनाऊंगा ,
आऊंगा और शब्दों की सृष्टि
पुनः पुनः रचाऊंगा,
मेरे शब्दों की पूंजी तेरे पास होगी ,
जब मांगू दे देना वरना ,
फिर से अभिशप्त हो जाऊंगा !!!फिर से अभिशप्त हो जाऊंगा




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10 टिप्पणियाँ:

स्वप्न मञ्जूषा ,  9 जुलाई 2009 को 4:31 pm बजे  

बे-haddd सुन्दर रचना...

रूप बदल जायेगा ?
पहचान पाओगी ?
तब तुम्हे कोई
इन्द्रधनुषी गीत सुनाऊंगा ,
आऊंगा और शब्दों की सृष्टि
पुन पुनः रचाऊंगा,
मेरे शब्दों की पूंजी तेरे पास होगी ,
जब मांगू दे देना वरना ,
फिर से अभिशप्त हो जाऊंगा !!!फिर से अभिशप्त हो जाऊंगा

आह्ह्ह..., मन खुश हो गया..... अब इससे ज्यादा तारीफ हमरे बस की नहीं है.....

Randhir Singh Suman,  10 जुलाई 2009 को 11:02 am बजे  

nice............nice..................nice.................nice

hem pandey,  10 जुलाई 2009 को 2:59 pm बजे  

'आऊंगा और शब्दों की सृष्टि
पुन पुनः रचाऊंगा,'
- सुन्दर.

राज भाटिय़ा,  13 जुलाई 2009 को 12:44 am बजे  

बहुत सुंदर कविता ओर उस पर एक बहुत ही सुंदर गीत...... भाई आप ने तो मन मोह लिया.
धन्यवाद

डॉ. मनोज मिश्र,  14 जुलाई 2009 को 8:43 am बजे  

' ज़िन्दगी ',की शाम हुयी
उम्र यूँ ही तमाम हुयी ,
ज्यूँ सूरज डूबेगा
त्यों ही रूह उसके नाम हुयी,
behtreen.

ज्योति सिंह,  15 जुलाई 2009 को 5:08 pm बजे  

" अपना क्या "

अपना क्या
' ज़िन्दगी ',की शाम हुयी
उम्र यूँ ही तमाम हुयी ,
ज्यूँ सूरज डूबेगा
त्यों ही रूह उसके नाम हुयी,
bahut sundar .agle janam ki sonch bhi shaamil bahut khoob hai .

सुधीर राघव,  22 अगस्त 2009 को 5:33 pm बजे  

अन्योनास्ति जी,
असल में यह आलेख नहीं हैं, यह तो उस व्यख्यान का हिस्सा है जो काटजू जी ने दिया। मुझे भी यह जानकारी रोचक और भविष्य में काम करने लायक लगी। इसलिए इसे ब्लॉग डायरी में दर्ज कर लिया। मिंमांसा पर कोई साथी काम कर रहा हो तो विचार साझा कर सकता है, अन्यथा भविष्य में इस पर काम करने का मन है। फिलहाल में इस ब्लॉग पर में सृष्टि निर्माण के वैदिक और पौराणिक विवरणों का अध्ययन कर रहा हूं। उसमें कुछ रोचक जानकारियां जल्द ही साझी करूंगा।
आपने इस पर ध्यान दिया और उत्साह बढ़ाया इसके लिए धन्यवाद।

alka sarwat mishra,  25 अगस्त 2009 को 3:30 pm बजे  

एकांत कभी अभिशाप नहीं होता ,वह साधना का मार्ग प्रशस्त करता है

Asha Joglekar,  26 अगस्त 2009 को 9:54 pm बजे  

मेरे शब्दों की पूंजी तेरे पास होगी ,
जब मांगू दे देना वरना ,
फिर से अभिशप्त हो जाऊंगा !!!फिर से अभिशप्त हो जाऊंगा
वाह, हम जैसों के पास यही तो पूंजी होती है । सुंदर रचना ।
मेरे ब्लॉग पर आप पधारें बहुत आबार आगे भी कृपा बनाये रखें ।

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हर व्यक्ति अपने मन के ' गुबारों 'से घुट रहा है ,पढ़े लिखे लोगों के लिए ब्लॉग एक अच्छा माध्यम उपलब्ध है
और जब से इन्टरनेट सेवाएं सस्ती एवं सर्व - सुलभ हुई और मिडिया में सेलीब्रिटिज के ब्लोग्स का जिक्र होना शुरू हुआ यह क्रेज और बढा है हो सकता हैं कल हमें मालूम हो कि इंटरनेट की ओर लोगों को आकर्षित करने हेतु यह एक पब्लिसिटी का शोशा मात्र था |

हर एक मन कविमन होता है , हर एक के अन्दर एक कथाकार या किस्सागो छुपा होता है | हर व्यक्ति एक अच्छा समालोचक होता है \और सभी अपने इर्दगिर्द एक रहस्यात्मक आभा-मंडल देखना चाहतें हैं ||
एक व्यक्तिगत सवाल ? इमानदार जवाब चाहूँगा :- क्या आप सदैव अपनी इंटीलेक्चुएलटीज या गुरुडम लादे लादे थकते नहीं ?

क्या आप का मन कभी किसी भी व्यवस्था के लिए खीज कर नहीं कहता
............................................

"उतार फेंक अपने तन मन पे ओढे सारे भार ,
नीचे हो हरी धरती ,ऊपर अनंत नीला आकाश,
भर सीने में सुबू की महकती शबनमी हवाएं ,
जोर-जोर से चिल्लाएं " हे हो , हे हो ,हे हो ",
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
फिर सुनते रहें गूंज अनुगूँज और प्रति गूंज||"

मेरा तो करता है : और मैं कर भी डालता हूँ

इसे अवश्य पढें " धार्मिकता एवं सम्प्रदायिकता का अन्तर " और पढ़ कर अपनी शंकाएँ उठायें ;
इस के साथ कुछ और भी है पर है सारगर्भित
बीच में एक लम्बा अरसा अव्यवस्थित रहा , परिवार में और खानदान में कई मौतें देखीं कई दोस्त खो दिये ;बस किसी तरीके से सम्हलने की जद्दोजहद जारी है देखें :---
" शब्द नित्य है या अनित्य?? "
बताईयेगा कितना सफल रहा |
हाँ मेरे सवाल का ज़वाब यदि आप खुले - आम देना न चाहें तो मेरे इ -मेल पर दे सकते है , ,पर दें जरुर !!!!



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