मंगलवार, 21 जुलाई 2009

'' कुछ करना है कुछ कर जाना है '' ,





  " कुछ करना  है : : कुछ  करजाना  है "
'' कुछ करना है कुछ कर जाना है ''

हर दिन साठ घटी का ही होता है ,
कुछ करना है कुछ कर जाना है ,

और वक्त लाएं कहाँ से समझ नही आता ,
पल-छिन पल-छिन कर हर दिन है गुजर जाता,

अपने ही वक्त की झोली से कुछ वक्त चुराएँ ,
?---,,,,... ....,,,,।---?'

खुली आँखों में आओ कुछ स्वप्न सजाएँ ,
स्वप्न खुली आँखों के देखे ही सच होते हैं ,

सच क्या होंगे उनके जो सपनों में हैं सोते ,
सजग रहना साथी स्वप्न बीच न सो जाना ,

वक्त नही मिलता वक्त नही मिलता
मत कहना यारों ,
इसी साठ घड़ी के दिन में करने वाले
सब कर जाते हैं ,


हम जैसे जीते जी मुर्दा मौत के दिन ही हैं मर जाते ,
वे ही मर कर भी हो अमर हैं अनंत-काल जीते रह जातें |
|


********************* *************** *****************




इस रचना के साथ मैं प्राचीन परम्पराओं का पालन करत हुए एक '' समस्या - पूर्ति '' भी दे रहा हूँ ,देखें छठी पंक्ति प्रश्न वाचक चिन्ह लिए है एक पंक्ति लगभग तैयार है की उसका स्थान ले सके , परन्तु मेरी उस पंक्ति में कोई कमी सी होने की अनुभूति मुझे हो रही है अतः उसे रोक कर मैं आप लोगों [[ पाठकों ]] को ''पंक्ति पूर्ति का स्नेह आमंत्रण दे रहा हूँ यदि कोई '' मन - भावन '' पंक्ति मिली जिसके पक्ष में अधिकांश पाठक होंगे ,उसे वहां डाल दिया जाएगा चयन के समय , एक दो दिन में संतुष्ट होने के बाद मैं अपनी पंक्ति भी यहाँ दे दूंगा , वह यानि मैं भी प्रतिभागी रहूँगा |
हाँ आप उक्त पंक्तियों को आगे पीछे अर्थात ऊपर नीचे अदल-बदल भी सकते हैं





Bookmark and Share

20 टिप्पणियाँ:

'अदा' 22 जुलाई 2009 को 12:32 am  

अपने ही वक्त की झोली से कुछ वक्त चुराएँ
उन चुराये हुए लम्हों से इक नया वक्त बनाएँ

देखिये, हम हो गए है फर्स्ट प्रतिभागी...

दिगम्बर नासवा 22 जुलाई 2009 को 2:05 pm  

कोशिश है............. आपके जितना सुन्दर तो शायेद ही हो............. आपकी लाजवाब रचना है यह

अपने ही वक्त की झोली से कुछ वक्त चुराएँ ,
कुछ सच्चे लम्हों को फिर से जी जाएँ

Renu Sharma 22 जुलाई 2009 को 6:18 pm  

नमस्कार जी ,
आपके द्वारा दी गई टिप्स मुझे अच्छी लगी .
धन्यवाद .
आपकी पंक्तियों के साथ कुच्छ कहना चाहती हूँ -

अपने ही वक्त की झोली से कुछ वक्त चुराएँ
कोर का आँसू वहीँ रोक लें , झूमें , नाचें , गायें .|

रेनू शर्मा ....

रज़िया "राज़" 23 जुलाई 2009 को 8:00 pm  

बहोत बढिया और पोज़िटीव विचारवाली रचना!! कुछ हमने भी प्रयत्न किया है...

अपने ही वक्त की झोली से कुछ वक्त चुराएँ ,
कहीं कोइ अजनबी उसे चुरा ना जाये।

वन्दना अवस्थी दुबे 24 जुलाई 2009 को 2:27 pm  

"और शिकायत खुद से-खुद की ही मिटायें"
मेरे दिमाग में तो बस घूम-फ़िर के यही पंक्तियां बार-बार आ रहीं हैं. वैसे दिगम्बर जी की पंक्तियां मुझे बहुत अच्छी लगीं.

Harkirat Haqeer 24 जुलाई 2009 को 11:08 pm  

अपने ही वक्त की झोली से कुछ वक्त चुराएँ
परोपकार का नन्हा पल भी है खुशियाँ दे जाता

hempandey 25 जुलाई 2009 को 3:04 pm  

कुछ हलके फुल्के क्षण जी लें -

अपने ही वक्त की झोली से कुछ वक्त चुराएँ
दूसरे की, झोली में सेंध न लगायें.

-- हा. हा. मजाक है. वैसे हमें स्वयं के अलावा दूसरे के समय का महत्त्व भी समझना चाहिए.

adwet 27 जुलाई 2009 को 11:42 pm  

apne apne blog ko bahut hi chatkile rango se sajaya hai. bhanwere bhi ayenge

डॉ. मनोज मिश्र 30 जुलाई 2009 को 6:16 pm  

हम जैसे जीते जी मुर्दा मौत के दिन ही हैं मर जाते ,
वे ही मर कर भी हो अमर हैं अनंत-काल जीते रह जातें ||
बेहतरीन लाइनें.

Mrs. Asha Joglekar 2 अगस्त 2009 को 9:57 pm  

अपने ही झोली से कुछ वक्त चुराएँ
कुछ लम्हें ले लें ? नया संसार बनाएँ ?
आपकी रचना तो सुंदर है ही पर यह समस्या वाला प्रयोग भी कमाल का है ।

BrijmohanShrivastava 4 अगस्त 2009 को 5:23 pm  

और पढने लायक कुछ लिख जाएँ

Pakhi 6 अगस्त 2009 को 12:25 am  

Sundar likha apne...achha laga.

पाखी की दुनिया में देखें-मेरी बोटिंग-ट्रिप !!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन 15 अगस्त 2009 को 8:32 am  

कबीरा जी, स्वतन्त्रता दिवस पर आपको शुभकामनाएं.

KK Yadav 15 अगस्त 2009 को 10:07 am  

Sundar koshish.

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें. "शब्द सृजन की ओर" पर इस बार-"समग्र रूप में देखें स्वाधीनता को"

रचना गौड़ ’भारती’ 15 अगस्त 2009 को 8:46 pm  

आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ-
रचना गौड़ ‘भारती’

ज्योति सिंह 17 अगस्त 2009 को 11:45 pm  

और वक्त लाएं कहाँ से समझ नही आता ,
पल-छिन पल-छिन कर हर दिन है गुजर जाता,
ati sundar bhagvati ji .jai hind .pahle naam ki khabar nahi rahi ab is jaankaari ke sang tasvir bhi nazar aai .

alka sarwat 18 अगस्त 2009 को 7:05 pm  

अच्छा गीत लिखा आपने ,मैं एक पंक्ति जोड़ती हूँ----
कुछ ख़ास काम कर ,जग में ,नाम अमर कर जाएँ

फिलहाल ,मुझे मेरी माता का यही आदेश है ,इसी लिए दिन-रात नयी खोज में जुटी रहती हूँ और उस खोज को आप लोगो तक पहुंचाती भी रहती हूँ

Vidhu 19 अगस्त 2009 को 1:22 pm  

आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ अच्छा लगा बहुत कुछ सामग्री पढने के बाद लगा कहीं कोई उदासी है ..इसे छोडें ...देखिये कितने लोग हें यहाँ ब्लॉगजगत में जो कहना है कहें कुछ ओरों की सुने कुछ अपनी कहें ..यू ही कट जायेगा सफर ..शुभकामनाएं

सुज्ञ 19 जून 2010 को 10:53 pm  

अपने ही वक्त की झोली से कुछ वक्त चुराएँ ,
पर वक्त मुट्ठी से रेत ज्यों सरक जाते है।

" रोमन[अंग्रेजी]मेंहिन्दी-उच्चारण टाइप करें: नागरी हिन्दी प्राप्त कर कॉपी-पेस्ट करें "

"रोमन[अंग्रेजी]मेंहिन्दी-उच्चारण टाइप करें:नागरी हिन्दी प्राप्त कर कॉपी-पेस्ट करें"

विजेट आपके ब्लॉग पर

TRASLATE

Translation

" उन्मुक्त हो जायें "



हर व्यक्ति अपने मन के ' गुबारों 'से घुट रहा है ,पढ़े लिखे लोगों के लिए ब्लॉग एक अच्छा माध्यम उपलब्ध है
और जब से इन्टरनेट सेवाएं सस्ती एवं सर्व - सुलभ हुई और मिडिया में सेलीब्रिटिज के ब्लोग्स का जिक्र होना शुरू हुआ यह क्रेज और बढा है हो सकता हैं कल हमें मालूम हो कि इंटरनेट की ओर लोगों को आकर्षित करने हेतु यह एक पब्लिसिटी का शोशा मात्र था |

हर एक मन कविमन होता है , हर एक के अन्दर एक कथाकार या किस्सागो छुपा होता है | हर व्यक्ति एक अच्छा समालोचक होता है \और सभी अपने इर्दगिर्द एक रहस्यात्मक आभा-मंडल देखना चाहतें हैं ||
एक व्यक्तिगत सवाल ? इमानदार जवाब चाहूँगा :- क्या आप सदैव अपनी इंटीलेक्चुएलटीज या गुरुडम लादे लादे थकते नहीं ?

क्या आप का मन कभी किसी भी व्यवस्था के लिए खीज कर नहीं कहता
............................................

"उतार फेंक अपने तन मन पे ओढे सारे भार ,
नीचे हो हरी धरती ,ऊपर अनंत नीला आकाश,
भर सीने में सुबू की महकती शबनमी हवाएं ,
जोर-जोर से चिल्लाएं " हे हो , हे हो ,हे हो ",
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
फिर सुनते रहें गूंज अनुगूँज और प्रति गूंज||"

मेरा तो करता है : और मैं कर भी डालता हूँ

इसे अवश्य पढें " धार्मिकता एवं सम्प्रदायिकता का अन्तर " और पढ़ कर अपनी शंकाएँ उठायें ;
इस के साथ कुछ और भी है पर है सारगर्भित
बीच में एक लम्बा अरसा अव्यवस्थित रहा , परिवार में और खानदान में कई मौतें देखीं कई दोस्त खो दिये ;बस किसी तरीके से सम्हलने की जद्दोजहद जारी है देखें :---
" शब्द नित्य है या अनित्य?? "
बताईयेगा कितना सफल रहा |
हाँ मेरे सवाल का ज़वाब यदि आप खुले - आम देना न चाहें तो मेरे इ -मेल पर दे सकते है , ,पर दें जरुर !!!!



कदमों के निशां

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP