शनिवार, 4 जुलाई 2009

"प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता "




"प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता "


" प्रकृति-चक्र "

हमारी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का जन्म एवं परिपोषण भी मूलतः प्रकृति के सानिध्य में स्वयं प्रकृति द्वारा किया गया था |, आज हम आधुनिकता की दौड में विकास के नाम पर उसी प्रकृति से दूर भाग रहे हैं ,हम यह भूल रहें हैं कि विकास का वास्तविक भावार्थ ' प्रकृति के और निकट जाकर उससे सामंजस्य बैठाते हुए उन्नति करना होता है , इस प्रक्रिया में प्रकृति अपना सर्वश्रेष्ठ उत्पाद जो हमारे जीवन -यापन का मूल आधार है हमें देती है और बदले में हमसे हमारा निकृष्ट - उच्छिष्ट जो सीधे हामारे लिए अनुपयोगी है मांगती है | परन्तु यहाँ एक बन्ध या शर्त भी है , जब हम प्रकृति से उसका सब से उत्कृष्ट लेने के बाद भी उसे प्रसंस्कारित कर के ही उपभोग करते हैं उसे पछोराते, चालते और धोने के अलावा और भी कई प्रक्रियों से गुजरातें है किसी किसी का रूप भी बदलतें हैं , उसके पश्चात उसे आग पर पकाते हैं तब हमारे अनुसार वह हमारे उपभोग के योग्य हो पाता है उसी प्रकार प्रकृति भी चाहती है प्रकृति को हम उसका भोज्य -पदार्थ संस्कारित कर के दें क्यों कि विकास कि उलटी दिशा कि ओर जाने के दौड़ में हमने प्रकृति के प्राकृतिक प्रसंस्कारण एवं शुद्धिकरण उद्योग का विनाश कर डाला है |

और यही "प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता " होगी








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5 टिप्पणियाँ:

Nirmla Kapila 5 जुलाई 2009 को 8:05 pm  

बिलकुल सही कहा है आपने आज मानव खुद ही अपने लिये विनाश का कूँआँ खोद रहा है मगर कौन इसे समझाये आपका बहुत बहुत धन्यवाद्

'अदा' 6 जुलाई 2009 को 6:07 am  

सोलह आने सही, लेकिन मानता कौन है, जब अब तक नहीं सुधरे तो आगे का सुधरेंगे , अब जाने दीजिये सब कहबे कर रहे हैं की २०१२ में दुनिया का अंत हो रहा है, हम तो वोही आसरा में बैठे हैं, की कब जान छूटे ......

sada 7 जुलाई 2009 को 11:16 am  

सबसे पहले तो मेरे ब्‍लाग पर आपके आने का अभिनन्‍दन, और मेरी रचनाओं को प्रोत्‍साहित करने के लिये आपका आभार् जिसकी वजह से मैं आपके इस सुन्‍दर से ब्‍लाग तक पहुंच सकी, आपने बिल्‍कुल सही कहा है इस प्रस्‍तुति के माध्‍यम से ।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी 8 जुलाई 2009 को 7:26 am  

अन्योनास्ति जी,
रचना पसन्द करने के लिये आप का धन्यवाद...
मैं कतई निराशावादी नहीं हूँ।आप जानते हैं मैं प्रसन्न वदन हूँ,हाँ कभी-कभी परेशान जरूर होता हूँ लेकिन अपने उस समय को भी मैं जाया नहीं होने देता बल्कि उस समय से कुछ ऐसी रचनाओं का प्रादुर्भाव हो जाता है जो सामान्य स्थिति में कभी संभव नहीं होता।मेरी बहुत सी रचनाएं इसी वजह से हर आम आदमी की अपनी बात लगती है क्योंकि वह सिर्फ़ सोचकर लिखी गयी नहीं है,वरन उसमें कुछ वास्तविकता भी है....[हाँ हर रोमांटिक रचना पर ये बात लागू नहीं होती;केवल कुछ पर ही].सच पूछिये तो मैं अपने कठिन दौर को अपने किसी रचना के लिये आया हुआ मान लेता हूँ और मैं गीत-ग़ज़ल गाते हुए अपना वह समय भी गुजार लेता हूँ...आपको कई ऐसी रचनाएं आगे भी मिलेंगी,जो ऐसे वक्त की धरोहर हैं और शायद ऐसा वक्त न आता तो ये रचनाएं भी नहीं होती........
आपने मुझे अपना समझकर मित्रवत सलाह दी,इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद.....

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हर व्यक्ति अपने मन के ' गुबारों 'से घुट रहा है ,पढ़े लिखे लोगों के लिए ब्लॉग एक अच्छा माध्यम उपलब्ध है
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हर एक मन कविमन होता है , हर एक के अन्दर एक कथाकार या किस्सागो छुपा होता है | हर व्यक्ति एक अच्छा समालोचक होता है \और सभी अपने इर्दगिर्द एक रहस्यात्मक आभा-मंडल देखना चाहतें हैं ||
एक व्यक्तिगत सवाल ? इमानदार जवाब चाहूँगा :- क्या आप सदैव अपनी इंटीलेक्चुएलटीज या गुरुडम लादे लादे थकते नहीं ?

क्या आप का मन कभी किसी भी व्यवस्था के लिए खीज कर नहीं कहता
............................................

"उतार फेंक अपने तन मन पे ओढे सारे भार ,
नीचे हो हरी धरती ,ऊपर अनंत नीला आकाश,
भर सीने में सुबू की महकती शबनमी हवाएं ,
जोर-जोर से चिल्लाएं " हे हो , हे हो ,हे हो ",
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
फिर सुनते रहें गूंज अनुगूँज और प्रति गूंज||"

मेरा तो करता है : और मैं कर भी डालता हूँ

इसे अवश्य पढें " धार्मिकता एवं सम्प्रदायिकता का अन्तर " और पढ़ कर अपनी शंकाएँ उठायें ;
इस के साथ कुछ और भी है पर है सारगर्भित
बीच में एक लम्बा अरसा अव्यवस्थित रहा , परिवार में और खानदान में कई मौतें देखीं कई दोस्त खो दिये ;बस किसी तरीके से सम्हलने की जद्दोजहद जारी है देखें :---
" शब्द नित्य है या अनित्य?? "
बताईयेगा कितना सफल रहा |
हाँ मेरे सवाल का ज़वाब यदि आप खुले - आम देना न चाहें तो मेरे इ -मेल पर दे सकते है , ,पर दें जरुर !!!!



कदमों के निशां

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