शनिवार, 18 जुलाई 2009

संवेदनाएं-2










नीचे दी रचना श्री दिगंबर नासवा, जी की एक रचना से प्रेरित , इसनें भाव तो उनके ही हैं ,यहाँ तक की लगभग सभी शब्द भी उन्ही के हैं ,मैं उनकी सम्बंधित रचना पढ़ प्रशंसात्मक टिप्पणी लिखने का प्रयत्न कर रहा था कि मैं यह कर बैठा ,उनकी उस रचना के उतरार्ध को छंद बद्ध करने का प्रयत्न करने कि गुस्ताखी कर बैठा उनकी अनुमति से उनको समर्पित करते हुए मैं इसे कबीरा पर प्रकाशित कर रहा हूँ | पाठक उनके ब्लॉग '' स्वप्न मेरे '' पर '' अनबुझी प्यास'' अवश्य पढ़ें


जैसे सहयात्री हो नीले सागर का ,
कोसों कोस साथ चले ये रेत-समुन्दर भी ,

तोड़ तट के हर बंधन उन्मुक्त सागर लहरें ,
करती उदघोष और नर्तन जब आतीं हैं '

ले आगोश हर रेती- कण की प्यास बुझाती हैं ,
सागर को अपनी छाया देते नीलाभ गगन पर,

ऐसे ही क्षण इन्द्रधनुषी रंग बिखर जातें है ,
पर प्यास अनन्त अतः मिलन दोहराए जाते हैं||
     ***********************************************************************
हाँ यह मेरी है ,प्रकाशन के पूर्व जरासी चूक से प्रथम अक्षर गायब होगया पता नही क्याथा ,कभी याद आया तो संशोधित कर दूंगा ,कम्प्यूटर फोर्मेट करते समय संकलन ही उड़ गया
संवेदना


??? ; संवेदना है /
मौन : सांत्वना है /
स्पर्श : सुकूं है /
शब्द : रुदन है =
??? : आँसू हैं /
मुस्कान : इबादत है /
हँसी : समर्पण है/
मिलन : ब्रह्म है //














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9 टिप्पणियाँ:

वन्दना अवस्थी दुबे 18 जुलाई 2009 को 4:27 pm  

ऐसे ही क्षण इन्द्रधनुषी रंग बिखर जातें है , पर प्यास अनन्त अतः मिलन दोहराए जाते हैं||
अतिसुन्दर.

ज्योति सिंह 18 जुलाई 2009 को 11:56 pm  

दिगंबर जी बहुत अच्छा लिखते है ,ये रचना भी सुन्दर है .

hempandey 19 जुलाई 2009 को 3:45 pm  

'प्यास अनन्त अतः मिलन दोहराए जाते हैं||'
-एक सच को उजागर करती सुन्दर पंक्तियाँ.

दिगम्बर नासवा 20 जुलाई 2009 को 1:28 pm  

आपने मेरे भावः को इतना सुन्दर शब्द संसार दिया है और मुझे भी कल्पना और शब्दों को मिश्रित कर लिखने की नयी प्रेरणा दी है......... लाजवाब

दिगम्बर नासवा 20 जुलाई 2009 को 1:30 pm  

आपने मेरे भावः को इतना सुन्दर शब्द संसार दिया है और मुझे भी कल्पना और शब्दों को मिश्रित कर लिखने की नयी प्रेरणा दी है......... लाजवाब

Nirmla Kapila 21 जुलाई 2009 को 6:23 pm  

नासवाजी की रचनायें इतनी संवेदना लिये होती हैं कि एक रचना से कई रचनायें रची जा सकती हैं उन्हें पढ कर एक सुखद अनुभूति होती है और आपने उस से एक लाजवाब रचना रची है बधाई्

रज़िया "राज़" 23 जुलाई 2009 को 7:53 pm  

??? ; संवेदना है /(धडकन)

मौन : सांत्वना है /

स्पर्श : सुकूं है /

शब्द : रुदन है =

??? : आँसू हैं /=(दर्द)
क्या ये जवाब हो सकते है? आपकी रचना मेन को बहोत भा गइ।

मुस्कान : इबादत है /

हँसी : समर्पण है/

मिलन : ब्रह्म है //

" रोमन[अंग्रेजी]मेंहिन्दी-उच्चारण टाइप करें: नागरी हिन्दी प्राप्त कर कॉपी-पेस्ट करें "

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" उन्मुक्त हो जायें "



हर व्यक्ति अपने मन के ' गुबारों 'से घुट रहा है ,पढ़े लिखे लोगों के लिए ब्लॉग एक अच्छा माध्यम उपलब्ध है
और जब से इन्टरनेट सेवाएं सस्ती एवं सर्व - सुलभ हुई और मिडिया में सेलीब्रिटिज के ब्लोग्स का जिक्र होना शुरू हुआ यह क्रेज और बढा है हो सकता हैं कल हमें मालूम हो कि इंटरनेट की ओर लोगों को आकर्षित करने हेतु यह एक पब्लिसिटी का शोशा मात्र था |

हर एक मन कविमन होता है , हर एक के अन्दर एक कथाकार या किस्सागो छुपा होता है | हर व्यक्ति एक अच्छा समालोचक होता है \और सभी अपने इर्दगिर्द एक रहस्यात्मक आभा-मंडल देखना चाहतें हैं ||
एक व्यक्तिगत सवाल ? इमानदार जवाब चाहूँगा :- क्या आप सदैव अपनी इंटीलेक्चुएलटीज या गुरुडम लादे लादे थकते नहीं ?

क्या आप का मन कभी किसी भी व्यवस्था के लिए खीज कर नहीं कहता
............................................

"उतार फेंक अपने तन मन पे ओढे सारे भार ,
नीचे हो हरी धरती ,ऊपर अनंत नीला आकाश,
भर सीने में सुबू की महकती शबनमी हवाएं ,
जोर-जोर से चिल्लाएं " हे हो , हे हो ,हे हो ",
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
फिर सुनते रहें गूंज अनुगूँज और प्रति गूंज||"

मेरा तो करता है : और मैं कर भी डालता हूँ

इसे अवश्य पढें " धार्मिकता एवं सम्प्रदायिकता का अन्तर " और पढ़ कर अपनी शंकाएँ उठायें ;
इस के साथ कुछ और भी है पर है सारगर्भित
बीच में एक लम्बा अरसा अव्यवस्थित रहा , परिवार में और खानदान में कई मौतें देखीं कई दोस्त खो दिये ;बस किसी तरीके से सम्हलने की जद्दोजहद जारी है देखें :---
" शब्द नित्य है या अनित्य?? "
बताईयेगा कितना सफल रहा |
हाँ मेरे सवाल का ज़वाब यदि आप खुले - आम देना न चाहें तो मेरे इ -मेल पर दे सकते है , ,पर दें जरुर !!!!



कदमों के निशां

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