बुधवार, 19 अगस्त 2009

'' बदरा क्यूँ वर्षा लायें ? ? ? ''


"प्रकृति के अनगढ़ जंगल हमने हैं मेंटे"

प्रकृति के अनगढ़ जंगल हमने हैं मेंटे,
पहले भिन्न भिन्न वृक्ष उन्हें लुभाते थे ,
देख झूमते प्राकृतिक वनों
और मयूर-यूथों का नृत्य ,

समझ उसे आमन्त्रण हो मंत्र मुग्ध ,
मेघा भी स्वयं नृत्य करने लग जाते ,
लय द्रुत होते ही बदरा छलक छलक जाते ,
सावन भादो में बदरा यूँ बरखा लाते थे ,

देख नृत्यान्त में छीजी गागर अपनी,
शेष जल भी यहीं उडेल ,
फिर चल पड़ती उनकी प्रति-यात्रा ,
पुनः पुनः जल लाने को ;

प्रकृति के अनगढ़ जंगल हमने मेंटे,
सुन्दर पंक्तिबद्ध बाग लगाये,
मयूर-जूथ नर्तक भी लुप्त हुये ,
विविधता के आकर्षण नष्ट हुए ,
रुके क्यों बदरा सरपट जो राह पाये ||




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23 टिप्पणियाँ:

रज़िया "राज़" 19 अगस्त 2009 को 3:50 pm  

प्रकृति कि मदमस्त रंगों से भरी कविता

दिगम्बर नासवा 20 अगस्त 2009 को 4:43 pm  

प्रकृति के अनगढ़ जंगल हमने मेंटे,
सुन्दर पंक्तिबद्ध बाग लगाये, मयूर-जूथ नर्तक भी लुप्त हुये ,
विविधता के आकर्षण नष्ट हुए ,

अपने आप से ही कितना jwalant prasn किया है ........... सच में praakriti को hamne ही nasht किया है ......... लाजवाब bhaav हैं आपकी रचना में ........... pranaam है मेरा

दर्पण साह "दर्शन" 22 अगस्त 2009 को 11:30 pm  

'' निंदक नेणे राखिये ,
आँगन कुटी छवाए||"

ji ninda karne jaisa to kuch bhi nahi hai...

...jab hoga wo bhi batayienge...

abhi to sawan ka anand lene do:

"देख नृत्यान्त में छीजी गागर अपनी, शेष जल भी यहीं उडेल , फिर चल पड़ती उनकी प्रति-यात्रा , पुनः पुनः जल लाने को ; "

badiya....
badiya
aur haan aapka koi purana post bhi padh leta hoon, aakhir mitron ka anurodh kaise taal sakte hain?

दर्पण साह "दर्शन" 22 अगस्त 2009 को 11:42 pm  

https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5192098414234791393&postID=4961942186720053896&page=1

humne to aapki purani post padh li asha karta hoon aap bhi apne purane comment padhte honge nahi padhte to uppar padh lein...
..badhiya likhte hain ji aap !!

:)

वन्दना अवस्थी दुबे 24 अगस्त 2009 को 12:18 pm  

सच है. पहले प्रकृति के साथ खिलवाड करते हैं फ़िर रोते हैं और उसी को कोसते भी हैं.सुन्दर रचना.

hem pandey 24 अगस्त 2009 को 8:47 pm  

मेघों के रूठ जाने की इस अनूठी परिभाषा के लिए साधुवाद.रचना सुन्दर लगी.

हैरान परेशान 25 अगस्त 2009 को 3:06 pm  

सम-सामयिक समस्या उठा ली आपने तो , ध्यान तो लोगो का जाता है पर आँखें बाद कर लेते हैं

alka sarwat mishra 25 अगस्त 2009 को 3:11 pm  

अब हमें प्रकृति को अपना दोस्त बनाना ही पडेगा ताकि बादल लौटें और हम झूमें -नाचें - गायें

vimi 27 अगस्त 2009 को 10:59 am  

bilkul sahi baat kahi aapne !! hum apne hi kiye ka phal bhugat rahe hain.

Nirmla Kapila 30 अगस्त 2009 को 4:15 pm  

बहुत दिन कुछ अच्छे ब्लोग्ज़ पर नहीं जा पाई थी जिस मे ये बलाग भी है इसके लिये क्षमा चाहती हूँ बहुत सी अच्छी रचनायों से वंचित रही धीरे धीरे पढूँगी बहुर सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति हौ आज जिस तरह प्रकृितिक संपदाओं का ह्रास हो रहा है आभार

Nirmla Kapila 30 अगस्त 2009 को 4:15 pm  

बहुत दिन कुछ अच्छे ब्लोग्ज़ पर नहीं जा पाई थी जिस मे ये बलाग भी है इसके लिये क्षमा चाहती हूँ बहुत सी अच्छी रचनायों से वंचित रही धीरे धीरे पढूँगी बहुर सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति हौ आज जिस तरह प्रकृितिक संपदाओं का ह्रास हो रहा है आभार

'अदा' 31 अगस्त 2009 को 5:33 am  

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !!!

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी 5 सितंबर 2009 को 10:51 pm  

सुन्दर रचना....सुन्दर अभिव्यक्ति...

Atmaram Sharma 7 सितंबर 2009 को 2:27 pm  

बहुत सुंदर विचार हैं.

'अदा' 10 सितंबर 2009 को 10:05 pm  

समझ उसे आमन्त्रण हो मंत्र मुग्ध , मेघा भी स्वयं नृत्य करने लग जाते , लय द्रुत होते ही बदरा छलक छलक जाते , सावन भादो में बदरा यूँ बरखा लाते थे ,
देख नृत्यान्त में छीजी गागर अपनी, शेष जल भी यहीं उडेल , फिर चल पड़ती उनकी प्रति-यात्रा , पुनः पुनः जल लाने को ;
आज एक बार फिर उपस्थित हूँ आपकी इस कविता को पढने के लिए....
बेहद प्रभावपूर्ण और अनुभूतिपूर्ण कविता.....
वर्षा ऋतू का ऐसा मनोरम चित्रण !!!
बहुत सुन्दर...

Dev 11 दिसंबर 2009 को 2:39 am  

वाह
अत्यंत उत्तम लेख है
काफी गहरे भाव छुपे है आपके लेख में
.........देवेन्द्र खरे
http://devendrakhare.blogspot.com

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी 27 दिसंबर 2009 को 6:49 pm  

आपकै कमेन्ट से हमका बड़ी ताकत मिली अब आगे लिखै कै
जोस और बढ़ गा अहै . आप असमर्थता के बावजूद हमार ब्लॉग पढ़ा गा
यहिसे बड़ा और कौन 'कमेन्ट' होये हमरे ताइं . हमार कोसिस ई है कि
अवधी मा एक बार फिर से गंभीर लेखन कै सुरुआत हुवे , अपने अस्तर पै
हम जूझत रहब लेकिन हम चाहित है कि और लोगन का यहि दिसा मा
आप प्रोत्साहित कीन जाय ..
... पायलागी ..
नए साल कै बधाई ..

๑♥!!अक्षय-मन!!♥๑, 28 जुलाई 2011 को 11:05 pm  

बहुत ही सुन्दर दर्शन.....
कुछ पंख्तिया आपके सम्मुख रखना चाहुइंगा

बड़ती हुई दरख्त का सुखा हुआ पत्ता
आधियों की फुँकार से उड़ता हुआ पत्ता

कोई रिश्ता,नाता सिर्फ़ खून से ही नही पनपता
देखो यहाँ प्रकृति की गोद में पलता हुआ पत्ता अक्षय-मन

अक्षय-मन "!!कुछ मुक्तक कुछ क्षणिकाएं!!" से

Jogendra Singh 31 दिसंबर 2011 को 9:36 pm  

▬● अच्छा लगा आपकी पोस्ट को देखकर... साथ ही आपका ब्लॉग देखकर भी अच्छा लगा... काफी मेहनत है इसमें आपकी...
नव वर्ष की पूर्व संध्या पर आपके लिए सपरिवार शुभकामनायें...

समय निकालकर मेरे ब्लॉग्स की तरफ भी आयें तो मुझे बेहद खुशी होगी...
[1] Gaane Anjaane | A Music Library (Bhoole Din, Bisri Yaaden..)
[2] Meri Lekhani, Mere Vichar..
.

Blogvarta 26 फ़रवरी 2013 को 2:06 am  

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" उन्मुक्त हो जायें "



हर व्यक्ति अपने मन के ' गुबारों 'से घुट रहा है ,पढ़े लिखे लोगों के लिए ब्लॉग एक अच्छा माध्यम उपलब्ध है
और जब से इन्टरनेट सेवाएं सस्ती एवं सर्व - सुलभ हुई और मिडिया में सेलीब्रिटिज के ब्लोग्स का जिक्र होना शुरू हुआ यह क्रेज और बढा है हो सकता हैं कल हमें मालूम हो कि इंटरनेट की ओर लोगों को आकर्षित करने हेतु यह एक पब्लिसिटी का शोशा मात्र था |

हर एक मन कविमन होता है , हर एक के अन्दर एक कथाकार या किस्सागो छुपा होता है | हर व्यक्ति एक अच्छा समालोचक होता है \और सभी अपने इर्दगिर्द एक रहस्यात्मक आभा-मंडल देखना चाहतें हैं ||
एक व्यक्तिगत सवाल ? इमानदार जवाब चाहूँगा :- क्या आप सदैव अपनी इंटीलेक्चुएलटीज या गुरुडम लादे लादे थकते नहीं ?

क्या आप का मन कभी किसी भी व्यवस्था के लिए खीज कर नहीं कहता
............................................

"उतार फेंक अपने तन मन पे ओढे सारे भार ,
नीचे हो हरी धरती ,ऊपर अनंत नीला आकाश,
भर सीने में सुबू की महकती शबनमी हवाएं ,
जोर-जोर से चिल्लाएं " हे हो , हे हो ,हे हो ",
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
फिर सुनते रहें गूंज अनुगूँज और प्रति गूंज||"

मेरा तो करता है : और मैं कर भी डालता हूँ

इसे अवश्य पढें " धार्मिकता एवं सम्प्रदायिकता का अन्तर " और पढ़ कर अपनी शंकाएँ उठायें ;
इस के साथ कुछ और भी है पर है सारगर्भित
बीच में एक लम्बा अरसा अव्यवस्थित रहा , परिवार में और खानदान में कई मौतें देखीं कई दोस्त खो दिये ;बस किसी तरीके से सम्हलने की जद्दोजहद जारी है देखें :---
" शब्द नित्य है या अनित्य?? "
बताईयेगा कितना सफल रहा |
हाँ मेरे सवाल का ज़वाब यदि आप खुले - आम देना न चाहें तो मेरे इ -मेल पर दे सकते है , ,पर दें जरुर !!!!



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