शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2008

                  


                         कबीरा खड़ा बाज़ार में ,लिए लुकाठी हाथ
 
जो फूँके घर आपणा, चले हमारे साथ
निंदक नेणे राखिये
आँगन कुटी छवाये

रहिमन धागा प्रेम का , तोड़ो मत चटकाय : :
टूटे फिर न जुड़े , जुड़े तो गाँठ पड़ जाए

5 टिप्पणियाँ:

शोभा 15 अक्तूबर 2008 को 7:43 pm  

अच्छा लिखा है. आपका स्वागत है.

बेनामी,  15 अक्तूबर 2008 को 9:16 pm  

Jis raah par har baar mujhe apna hi koi ghalta raha,
phir bhi naa jaane kiyon us raah hi chalta raha.
Socha bahut is baar to rooshni nahi dhuyan doonga,
Lekin chiragh tha phitaratan jalta raha,jalta raha.

AAP KA SWAGAT HAI..........
KAVI DEEPAK SHARMA
http://www.kavideepaksharma.blogspot.com
http://shauardeepaksharma.blogspot.com
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kapil 28 अक्तूबर 2008 को 9:31 am  

हमारे मन का दीप खूब रौशन हो और उजियारा सारे जगत में फ़ैल जाए इसी कामना के साथ दीपावली की आप सबको बहुत बहुत बधाई।

मा पलायनम ! 18 नवंबर 2008 को 10:34 pm  

यह सब जीवन के अमूल्य धरोहर और प्रेरक विचार हैं .आराम के साथ जीना है तो इसे हमेशा याद रखना होगा .

" रोमन[अंग्रेजी]मेंहिन्दी-उच्चारण टाइप करें: नागरी हिन्दी प्राप्त कर कॉपी-पेस्ट करें "

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" उन्मुक्त हो जायें "



हर व्यक्ति अपने मन के ' गुबारों 'से घुट रहा है ,पढ़े लिखे लोगों के लिए ब्लॉग एक अच्छा माध्यम उपलब्ध है
और जब से इन्टरनेट सेवाएं सस्ती एवं सर्व - सुलभ हुई और मिडिया में सेलीब्रिटिज के ब्लोग्स का जिक्र होना शुरू हुआ यह क्रेज और बढा है हो सकता हैं कल हमें मालूम हो कि इंटरनेट की ओर लोगों को आकर्षित करने हेतु यह एक पब्लिसिटी का शोशा मात्र था |

हर एक मन कविमन होता है , हर एक के अन्दर एक कथाकार या किस्सागो छुपा होता है | हर व्यक्ति एक अच्छा समालोचक होता है \और सभी अपने इर्दगिर्द एक रहस्यात्मक आभा-मंडल देखना चाहतें हैं ||
एक व्यक्तिगत सवाल ? इमानदार जवाब चाहूँगा :- क्या आप सदैव अपनी इंटीलेक्चुएलटीज या गुरुडम लादे लादे थकते नहीं ?

क्या आप का मन कभी किसी भी व्यवस्था के लिए खीज कर नहीं कहता
............................................

"उतार फेंक अपने तन मन पे ओढे सारे भार ,
नीचे हो हरी धरती ,ऊपर अनंत नीला आकाश,
भर सीने में सुबू की महकती शबनमी हवाएं ,
जोर-जोर से चिल्लाएं " हे हो , हे हो ,हे हो ",
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
फिर सुनते रहें गूंज अनुगूँज और प्रति गूंज||"

मेरा तो करता है : और मैं कर भी डालता हूँ

इसे अवश्य पढें " धार्मिकता एवं सम्प्रदायिकता का अन्तर " और पढ़ कर अपनी शंकाएँ उठायें ;
इस के साथ कुछ और भी है पर है सारगर्भित
बीच में एक लम्बा अरसा अव्यवस्थित रहा , परिवार में और खानदान में कई मौतें देखीं कई दोस्त खो दिये ;बस किसी तरीके से सम्हलने की जद्दोजहद जारी है देखें :---
" शब्द नित्य है या अनित्य?? "
बताईयेगा कितना सफल रहा |
हाँ मेरे सवाल का ज़वाब यदि आप खुले - आम देना न चाहें तो मेरे इ -मेल पर दे सकते है , ,पर दें जरुर !!!!



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