गुरुवार, 25 जून 2009
मंगलवार, 23 जून 2009
'' बस यूँ ही ''
'' बस यूँ ही ''
जिंदगी की रहगुज़र , जाने कितना भटकेंगे , कितने साथ मिलेंगे , कितने हाथ हैं छूटेंगे , जीना है टुकडों-टुकडों में, जाने कितने टुकड़े सहजेगे , कितने टुकड़े अभी और भी टूटेंगे|| ********************************************** श्याम सखा "श्याम " के ब्लॉग पर पोस्ट एक कविता से प्रेरित {सादर} कुछ यक्ष प्रश्न भी होते है , कैसे इनसे छुटकारा पाएंगे , लहरों -तुफानो से कर यारी , खुद तो पार निकल जायेंगे , छोड़ी जो मझधार कश्ती , औरों को कैसे पार लगायेंगे ?
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शुक्रवार, 19 जून 2009
" काग़ज़ भी पिघलेगा ",
"काग़ज़ भी पिघलेगा, "
यह ज़हां है इक मेला , हर इक ज़िंदगानी सजाती , अपना-अपना खेला , रूप पर तो बहरूप है ही, पर बहुतों ने बहरूप पर भी, रूप का लगाया झमेला !! क्या कभी देखा नहीं , किसी को भीड़ में भी अकेला, किसी का मौन भी मुखर होता है, पर कभी पढ़ना तुम किसी की , प्रखर-मुखरता के पीछे का लेखा || तेरे ही आंसू से काग़ज़ भी पिघलेगा, लेखनी कांपेगी, शब्द खो जायेंगे , उस पीड़ा से , सारी अनुभूतियाँ सारी सवेदानाएं सारे भावः , फ़िर से निरक्षर हो जायेंगे || जिस क्षण तुम, इस अन्तरिक्षीय निशाब्द्धता को , शब्द रूप देपाओगे , उसी क्षण से , भवभूति-वाल्मीकि-कालिदास से हो जाओगे ||
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मंगलवार, 16 जून 2009
'' इसी लिए तो नीलकंठ नहीं .....''
निराशाओं के हलाहल-सागर मध्य से , असफलताओं का बोझ ले, पुनः-पुनः संघर्ष करते गुज़रना, नीलकंठ होने की मात्र अनुभूति ही दे पाता है , और हो बाध्य तभी हम , स्वीकार पाते हैं 'माँ फलेषु कदचिना ' || हाय रे फ़िर भी हम नीलकंठ हो पाते , इन्सां हैं हम चुभती है, असफलताओं की फांस ; कभी-कभी , रिश्ते हमारे बना इन्ही का नश्तर हैं चुभाते, इस पीड़ा संग राग-द्वेष निर्लिप्त नहीं हम , इसी लिए तो नीलकंठ नही हो पाते | नीलकंठ नही हो पाते||
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रविवार, 14 जून 2009
" काश मैं भी हो पता नीलकंठ "
| " काश मैं भी हो पता नीलकंठ " |
कोशिश कर कभी सुनना विरानो के गीत , तन्हाई की सिसकियां भी होंगी ऐ अनजाने मीत ! खामोशी का संगीत जब भी आप गुनगुनायेंगे , लय की लरज़ में मुझे ही अकेला खडा पायेगे ! अपनी हर हर नज्म में ,कर्ण की रुसवाई को जीता हुआ मुझे ही पायेंगें ,भीष्म की तन्हाईयों का विष पीता हुआ! घायल रूहों का कारवां लिए,काँधे पे उठाये उम्मीदों का सलीब ; सत्य-आग्रही गाँधी मैं हुआ नही, ,कहाँ से लाता ईसा सा नसीब !! इस धरा की सारी रुसवाई : तनहाई का विष मैं पी जाता : जी जाता : मैं भी होता अगर नीलकंठ , हो पाता मैं भी काश नीलकंठ !! हो पाता मैं भी काश नीलकंठ !! मैं भी काश नीलकंठ!! मैं भी नीलकंठ !!
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पूर्व प्रकाशित कविता आप के समक्ष कुछ संशोधनों के साथ पुनः प्रस्तुत है,पुरानी हटा दी गई है
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